भरी सभा में साहित्यकार को अपमानित करने का आरोप.. घासीदास विश्वविद्यालय कुलपति पर उठे सवाल
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गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में साहित्यकार के अपमान के आरोप को लेकर शैक्षणिक और साहित्यिक हलकों में नाराज़गी ।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मंच से की गई टिप्पणी को साहित्य और अभिव्यक्ति के सम्मान के खिलाफ बताया जा रहा है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने पूरे घटनाक्रम को संदर्भ से जोड़कर देखने की बात कही, जांच या स्पष्टीकरण की संभावना जताई।
Delhi / छत्तीसगढ़ स्थित गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान उत्पन्न हुए विवाद को लेकर सुर्खियों में आ गया है। विश्वविद्यालय के कुलपति पर आरोप है कि उन्होंने भरी सभा में एक वरिष्ठ साहित्यकार को अपमानित करने वाली टिप्पणी की। इस घटना के बाद साहित्यिक जगत और शैक्षणिक समुदाय में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
बताया जा रहा है कि विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित एक औपचारिक कार्यक्रम के दौरान मंच से की गई टिप्पणी को लेकर विवाद खड़ा हुआ। कार्यक्रम में मौजूद कुछ लोगों का दावा है कि कुलपति के शब्दों और लहजे से आमंत्रित साहित्यकार की गरिमा को ठेस पहुंची। जैसे ही यह मामला सामने आया, सोशल मीडिया और साहित्यिक मंचों पर इसे साहित्य के सम्मान से जोड़कर देखा जाने लगा।
साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग का कहना है कि विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक संस्थानों में संवाद और आलोचना की मर्यादा बनाए रखना अनिवार्य है। उनका मानना है कि किसी भी रचनाकार का सार्वजनिक रूप से अपमान न केवल व्यक्तिगत मामला है, बल्कि यह साहित्य और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के सम्मान से भी जुड़ा विषय है।
वहीं, विश्वविद्यालय प्रशासन से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पूरे घटनाक्रम को संदर्भ से अलग करके देखा जा रहा है। प्रशासन का दावा है कि कुलपति की टिप्पणी का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अपमानित करना नहीं था, बल्कि विषयवस्तु पर असहमति जताना था। हालांकि, इस मुद्दे पर आधिकारिक बयान या स्पष्टीकरण की मांग लगातार तेज होती जा रही है।
छात्र संगठनों और शिक्षकों के कुछ समूहों ने भी इस विवाद पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय परिसर में साहित्य, संस्कृति और विचारों का सम्मान होना चाहिए। यदि किसी भी स्तर पर असंवेदनशीलता दिखाई गई है, तो उस पर आत्ममंथन और संवाद जरूरी है।
फिलहाल यह मामला आरोप और प्रतिक्रियाओं के बीच घिरा हुआ है। सभी की नजर विश्वविद्यालय प्रशासन के अगले कदम पर टिकी है—क्या इस पर औपचारिक स्पष्टीकरण आएगा या आंतरिक समीक्षा की जाएगी। यह विवाद एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि शैक्षणिक मंचों पर संवाद की मर्यादा कितनी महत्वपूर्ण है।